भारत में उच्च शिक्षा का अंतरराष्ट्रीयकरण 

पाठ्यक्रम: GS2/ शिक्षा

संदर्भ

  • शिक्षा मंत्रालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के “भारत में विदेशी उच्च शिक्षण संस्थानों के परिसरों की स्थापना एवं संचालन विनियम, 2023” के अंतर्गत लिवरपूल विश्वविद्यालय को बेंगलुरु में अपना शाखा परिसर स्थापित करने हेतु स्वीकृति-पत्र (LoA) प्रदान किया है।

उच्च शिक्षा का अंतरराष्ट्रीयकरण क्या है?

  • उच्च शिक्षा का अंतरराष्ट्रीयकरण वह प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत शिक्षण, अनुसंधान, प्रशासन तथा शैक्षणिक सहयोग में वैश्विक, अंतरराष्ट्रीय एवं अंतर-सांस्कृतिक आयामों का समावेश किया जाता है।
  • इस प्रक्रिया में विद्यार्थियों एवं शिक्षकों की अंतरराष्ट्रीय गतिशीलता , अंतरराष्ट्रीय शोध साझेदारियाँ, विदेशी विश्वविद्यालय परिसरों की स्थापना, संयुक्त डिग्री कार्यक्रम तथा सीमापार शैक्षणिक सेवाएँ सम्मिलित होती हैं।

भारत में उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण की आवश्यकता

  • शैक्षणिक उत्कृष्टता को प्रोत्साहन: अंतरराष्ट्रीयकरण वैश्विक मानकों पर आधारित पाठ्यक्रमों, शिक्षण पद्धतियों तथा गुणवत्ता आश्वासन मानकों को अपनाने को प्रोत्साहित करता है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता एवं परिणामों में सुधार होता है।
  • भविष्य के लिए सक्षम कार्यबल का निर्माण: अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोणों से परिचय विद्यार्थियों में आलोचनात्मक चिंतन, अंतर-सांस्कृतिक दक्षता तथा वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था के अनुरूप आवश्यक कौशलों का विकास करता है।
  • शैक्षणिक प्रतिभा एवं संसाधनों का संरक्षण: देश के अंदर विश्वस्तरीय शैक्षणिक अवसरों की उपलब्धता विद्यार्थियों के विदेश गमन तथा उससे होने वाले विदेशी मुद्रा के व्यय को कम कर सकती है।
    • भारत अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों के सबसे बड़े स्रोत देशों में से एक है तथा 13 लाख से अधिक भारतीय विद्यार्थी विदेशों में अध्ययन कर रहे हैं।
  • शैक्षिक कूटनीति का सुदृढ़ीकरण: शैक्षणिक सहयोग द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ करता है तथा भारत की सॉफ्ट पावर और वैश्विक प्रभाव को बढ़ाता है।
  • वैश्विक शिक्षा केंद्र बनने की परिकल्पना: भारत को उच्च शिक्षा, अनुसंधान एवं ज्ञान-सृजन के एक प्रमुख वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए अंतरराष्ट्रीयकरण अत्यंत आवश्यक है।

अंतरराष्ट्रीयकरण से संबंधित चुनौतियाँ

  • उच्च लागत: विदेशी संस्थानों द्वारा संचालित कार्यक्रम आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए वहनीय न हो सकते हैं।
  • क्षेत्रीय असमानताएँ: अधिकांश विदेशी संस्थान महानगरों को प्राथमिकता दे सकते हैं, जिससे छोटे शहर एवं ग्रामीण क्षेत्र विकास से वंचित रह सकते हैं।
  • प्रतिस्पर्धात्मक दबाव: प्रतिभाशाली विद्यार्थियों, शिक्षकों तथा अनुसंधान वित्तपोषण को आकर्षित करने में सार्वजनिक विश्वविद्यालयों को कठिन प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है।
  • शिक्षा का व्यावसायीकरण: लाभ अर्जन पर अत्यधिक बल उच्च शिक्षा के व्यापक सामाजिक उद्देश्यों को कमजोर कर सकता है।

भारत द्वारा उठाए गए प्रमुख कदम

  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 : राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 ने उच्च शिक्षा सुधारों के केंद्र में अंतरराष्ट्रीयकरण को स्थान दिया है। यह नीति विश्व के अग्रणी विश्वविद्यालयों के भारत में प्रवेश तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्रोत्साहित करती है।
  • यूजीसी विनियम, 2023: यूजीसी विनियम, 2023 ने विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए एक नियामक ढाँचा प्रदान किया है। इसके अंतर्गत उच्च रैंकिंग वाले विदेशी विश्वविद्यालयों को वैश्विक मानकों को बनाए रखते हुए भारत में परिसर स्थापित करने की अनुमति दी गई है।
  • स्टडी इन इंडिया (SII) कार्यक्रम: यह भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की एक प्रमुख पहल है, जिसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों को भारत में अध्ययन हेतु आकर्षित करना है।
  • शैक्षणिक एवं अनुसंधान सहयोग संवर्धन योजना (SPARC): यह योजना शीर्ष भारतीय संस्थानों तथा विश्व के अग्रणी विश्वविद्यालयों के बीच संयुक्त अनुसंधान परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान कर भारत के अनुसंधान पारितंत्र को सुदृढ़ बनाने का प्रयास करती है।
  • ग्लोबल इनिशिएटिव ऑफ अकादमिक नेटवर्क्स (GIAN): यह पहल प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शिक्षकों एवं शोधकर्ताओं को अल्पकालिक अथवा सेमेस्टर-आधारित पाठ्यक्रमों के शिक्षण तथा भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों के साथ सहयोग हेतु आमंत्रित करके शैक्षणिक सहयोग को बढ़ावा देती है।
  • भारत में संचालित विदेशी विश्वविद्यालय परिसर:
  • डीकिन विश्वविद्यालय – गिफ्ट सिटी, गुजरात (संचालन वर्ष 2024 से)
  • यूनिवर्सिटी ऑफ वोलोंगोंग – गिफ्ट सिटी, गुजरात (संचालन वर्ष 2024 से)
  • यूनिवर्सिटी ऑफ साउथेम्प्टन – गुरुग्राम, हरियाणा (संचालन वर्ष 2025 से)

वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ 

  • सिंगापुर: सिंगापुर ने अपनी “ग्लोबल स्कूलहाउस” रणनीति तथा उच्च शिक्षा एवं अनुसंधान में व्यापक निवेश के माध्यम से स्वयं को एक अग्रणी वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में स्थापित किया है।
  • संयुक्त अरब अमीरात (UAE): संयुक्त अरब अमीरात में 40 से अधिक अंतरराष्ट्रीय शाखा परिसर संचालित हैं, जिससे यह अंतरराष्ट्रीय शिक्षा के सबसे बड़े वैश्विक केंद्रों में से एक बन गया है।
    • दुबई इंटरनेशनल अकादमिक सिटी जैसे शिक्षा क्षेत्रों में यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, भारत तथा अन्य देशों के विश्वविद्यालय संचालित हैं।
  • चीन: चीन ने अनेक सफल संयुक्त विश्वविद्यालयों की स्थापना की है, जिनमें यूनिवर्सिटी ऑफ नॉटिंघम निंगबो चाइना तथा शीआन जियाओतोंग-लिवरपूल विश्वविद्यालय प्रमुख हैं।

आगे की राह 

  • घरेलू संस्थानों का सशक्तिकरण: अंतरराष्ट्रीयकरण भारतीय विश्वविद्यालयों के विकास का पूरक होना चाहिए, उसका विकल्प नहीं।
  • संख्या के बजाय गुणवत्ता को प्राथमिकता: भारत को ऐसे उच्च गुणवत्ता वाले विदेशी संस्थानों को आकर्षित करना चाहिए, जो शैक्षणिक उत्कृष्टता, अनुसंधान तथा नवाचार में सार्थक योगदान दें।
  • समावेशी पहुँच सुनिश्चित करना: वैश्विक स्तर की शिक्षा को समाज के सभी वर्गों के लिए सुलभ बनाने हेतु छात्रवृत्तियों एवं वित्तीय सहायता का विस्तार किया जाना चाहिए।

स्रोत: PIB

 

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